*देवनाथपट्टी का युवा कर रहा है,अधिकार के लिए आवाज बुलंद*
*अपना समाज आपका सुझाव देवनाथपट्टी युवा सदस्य*
इतिहास गवाह है युवाओं ने जब भी परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई है एक नई क्रांति का आगाज हुआ है और देवनाथपट्टी गाँव के युवा परिवर्तन की पटकथा लिख रहे हैं लेकिन एक बड़ा सवाल है कि आखिर कहाँ चूक हुआ कि कभी यहा संघर्ष के बदौलत बने सबसे छोटा गाँव मे मुखिया तेजनारायण बाबू के समय मे जो कुछ जो ही हुआ उनके समय फंड भी उतना नही था सूनता हूँ और देखता भी उनके द्वारा बनाये गये गाँव के चारो तरफ छरकी जो आज भी यहाँ के किसान के लिए सबसे बड़ा धरोहर है गाँव से नदी की ओर जाने वाली मुख्य सड़क जो भविष्य मे आपके जिला मुख्यालेय जाने के लिए इस गाँव के लिए सबसे बड़ी सड़क है आज मे देखता हूँ उन के बाद ऐसा कोई काम यहाँ नही हो पाया जो इस गाँव के लिए कीया गया हो उस ढंग का विकास अब तक नहीं हो पाया जैसा उम्मीद था
दरअसल बचपन में स्कूल जाने के रास्ते में एक दीवार पर लिखा रहता था हम सुधरेगे जग सुधरेगा उस वक्त इसका मतलब समझ में आए ना आए लेकिन इस वाक्य को पढ़ते हर रोज थे. हालांकि अब एक बात समझ में आया है कि हम सुधरेंगे तो दरअसल जग नहीं सुधरेगा बल्कि दुनिया के और लोग सुधरे हुए आदमी को नेता बना कर उसको उसी समाज के समस्या के तथाकथित कारक परंपरागत नेता में तब्दील कर देंगे और फिर उसकी आलोचना की जाएगी जबकि आदर्श स्थिति में होना यह चाहिए कि अगर कोई कुछ अच्छा या अलग काम कर रहा है समाज सुधारने के लिए अगर थोड़ा भी प्रयास कर रहा है तो उससे प्रेरणा लेकर वही चीज़ हम खुद भी करें ना कि जो वह कर रहा है उसको महिमामंडित कर एक स्थापित या घाघ नेता में तब्दील कर दे ।
वैसे भी दुनिया का परंपरा रहा है परिवर्तन होते रहना चाहिए क्योंकि रुकना किसी भी चीज का सही नहीं है पानी खून समय या कुछ भी हो, हर बार एक नया चेहरा आए क्रांतिवीर के रूप में और समाज को एक नया दिशा दें दरअसल हम समाज को जितना समझ पाए हैं समाज के लोग नेगेटिव चीज को ज्यादा पसंद करते हैं कुछ ठीक करने के बजाय उसकी आलोचना करना ज्यादा महत्वपूर्ण समाज के लिए हो जाता है जब की ऐसा होना नहीं चाहिए लेकिन सच्चाई यही है !
समाज का एक और दुखद दृष्टिकोण किसी को नेता मान लेना है । कोई किसी को क्यों नेता मान लेता है ? क्या हम खुद के नेता खुद नहीं हो सकते हैं क्यों हम किसी को सर्व शक्तिमान मान और उसके चारों ओर परिक्रमा करें क्या कमी है हम में क्या हम अपने खुद का समस्या आसपास के समस्या के लिए संघर्ष करने की स्थिति में नहीं है ? नही हैं तो क्यों ! बहरहाल यही सब कारण रहा होगा कि देवनाथपट्टी मे मुखिया जी के बाद जैसी विकास होना चाहिए था वैसी हो नहीं पाया। और लोग कोसते हैं जनप्रतिनिधियों को अधिकारियों को लेकिन कहीं ना कहीं उनके साथ साथ हम और आप खुद भी गुनाहगार है क्योंकि हम सब गलत को गलत कहना भूल गए समस्याओं को उठाना छोड़ दिए कंप्रोमाइज करना शुरू कर दिए और अगर थोड़ा जागरूक है तो इन सब चीजों के लिए किसी व्यक्ति पर निर्भर हो गए है जिसे हम अपना नेता मान बैठे है जबकि समस्याओं के समाधान के लिए खुद लड़ाई लड़ने का जरूरत था या है भी ।
कुछ नही कर सकते तो गलत के खिलाफ लिख तो सकते है दरअसल समाज के हित की लड़ाई में इस गाँव के लोगों का भी काफी अहम योगदान रहता है हाल फिलहाल मे ऐसे उदाहरण दिखे गये है।शान और की यह भूमि है
हर वर्ष यहां के लोग बाढ़ की विभीषिका झेलते हैं इन सबके बावजूद भी जो विकास होना चाहिए था नहीं हो पाया इसका बड़ा कारण इस गाँव के विकास के लिए यहाँ के जनप्रतिनिधी और समाज दोनों को साझा प्रयास करने की आवश्यकता है,लेकिन सच्चाई है दोनों मे से किसी का प्रयास सराहनीय नही कहा जा सकता है. हां दोनों ने दूसरे का आलोचना खूब जमकर किया है जनप्रतिनिधी कहते लोग जागरुक नहीं है वही समाज कहते है कि जनप्रतिनिधी ने प्रयास नहीं किया है आरोप प्रत्यारोप के दौर में गाँव का विकास नहीं हो पाया है अगर यह कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
दरअसल परिवर्तन के लिए समाज के लोग अगर आगे आ रहे हैं तो उन्हे हर घृणित चीज जो समाज में अब भी समान्य माना जाता है उसे ना करना या कहना सीखना होगा हमें बदलाव के आवाज मे गति लानी होगी
इस तरह के परिवर्तन के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि औरों से पहले खुद से जंग लड़ना होगा,समाज के सभी लोगों को क्षेत्र के उत्थान के लिए आगे बढ़ना होगा
हर समस्या के लिए जनप्रतिनिधी पर उंगली उठाने के साथ-साथ समाज को भी अपना कर्तव्य निभाना होगा जैसे कि गाँव मे लोगो को में अपने अधिकार एवं विकाश के रास्ता को समझाना होगा एकजूटा तो बनानी पड़े गी वहाँ पर सरकार की आलोचना करने के साथ-साथ गाँव के शिक्षित लोग को समय निकालकर गाँव में जाकर गाँव वालो को समझाना होगा ये अकेला संभव नही है हम सभी को मिलकर करना होगा अपने गाँव के हित के लिए बस एक बार प्रयाश करना पड़ेगा गाँव का विकाश होगा तो कही न कही सब का फायदा होगा न होगा तो जैसे के तैसे तो है ही।
दरअसल हमे आजाद हुए सात दशक से ऊपर हो गए है अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त जरूर हो गए हम हालांकि उस समय संघर्ष का अलग मतलब था अपनी धरती अपने आकाश पर हक की लड़ाई थी
उसके बाद कुछ समय तक नई प्राप्त स्वतंत्रता में व्यवस्थाएं प्रणालियां तय होती रही और वह दौड़ भी गुजर गया
इन व्यवस्थाओं में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन तो हुआ लेकिन मानसिक परिवर्तन जैसा होना चाहिए था नही हुआ,गुलाम सोच लोगों में चिपका ही रह गया,कम से कम महिलाओं से जुड़ी धारणाओं के बारे में तो ऐसा ही कहा जा सकता है दहेज और समानता, कन्या भ्रूण हत्या और सुरक्षा के मसले पर जो व्यवस्था की गई इससे समाज मे महिलाओं की स्थिति मे विशेष परिवर्तन नही हुआ
भगत सिंह ने कहा है कि जो व्यक्ति विकास के लिए खड़ा है उसे हर रूढ़िवादी चीज की आलोचना करनी होगी उसमें अविश्वास करना होगा तथा उसे चुनौती देनी होगी
ये बिल्कुल सही भी इसलिए हैं क्योंकि परिवर्तन के लिए पहले जनजागरण फिर आंदोलन जरूरी हैं, जनजागरण के बाद गाँव की 50% आबादी भी बात को समझने लगे,गलत के खिलाफ आवाज उठाना सिख जाए, तो वही परिवर्तन का सृजन होना शुरू हो जाएगा
दरअसल हम समाजीकता की भी बात करते हैं लेकिन हम सब का इसमें भी कोई विशेष विश्वास नही हैं,ऐसा इसलिए प्रतित होता क्योंकि जहाँ एक ओर संस्कृति या धर्म के आधार पर हम सभी नदी पेड़ पौधे यहाँ तक की स्त्री को देवी देवता मानते हैं वही दुसरी ओर इसकी स्थिति बिल्कुल विपरीत हैं ।
दरअसल हम दोषी हैं हर उस चीज के लिए जिस पर हम यह सोच कर ध्यान नही देते हैं कि इससे हमारा क्या वास्ता हैं.हर उस वक्त जब हमने गलत के खिलाफ आवाज नही उठाया हम दोषी हैं ! किसी ने कहा है कि अन्याय करने के साथ-साथ अन्याय सहने वाला दोनों बराबर का दोषी है
क्योंकि हम या आप अपने उस आवाज को उठानें में असमर्थ रहें जो आवाज बदलाव ला सकतें थें,दरअसल हम डरतें हैं सबके सामने आकर खुल कर कहनें सें लोगों से अलग दिखाई देने में.अगर आप या हम यह निश्चय कर लेते हैं कि अब चुप नही बैठेंगे तो धीरे धीरे समाज की सोच में बदलाब आने लगता हैं उनकी सोच बदलने लगती हैं, हर विषयों के प्रति उनमें सवेंदनशीलता आने लगती हैं.
जब हम या आप किसी चीज के खिलाफ खड़े होने का फैसला करतें हैं तो भले ही शुरूआत में लोग आपका विरोध करें लेकिन लोग बाद में आपकों समझनें लगतें हैं.
और यदि हमें लोगों की सोच बदलना हैं तो इसकी शुरूआत हमें खुद से करना होगा.
याद रखिए कुछ लोगो के आवाज को दबाया जा सकता है समूह के आवाज को नही दवाया जा सकता हैं.
जहां तक सवाल है आलोचकों का तो हर काल में समाज में कुछ आलोचक रहे हैं उन्हें नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ने की आवश्यकता है हालांकि आलोचना भी कई मायनों में जरूरी है क्योंकि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में हर चीज पर तर्क वितर्क होना चाहिए हम किसी भी बात को बिना तर्क के मान ले तो निश्चित रुप से यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सही नहीं है
परिवर्तन के रास्ते में कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो बोलेंगे ये सबसे से होता क्या है दरअसल इससे सिद्ध होता है हम जीवित हैं अटल हैं और मैदान से हटे नहीं है हमें अपने हार ना मानने वाले स्वाभिमान का प्रमाण देना है हमें यह दिखाना है कि हम गोलियों और अत्याचारों से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं है हम उस व्यवस्था का अंत कर के रहेंगे जिसका आधार स्वार्थीपन है
दरअसल संघर्ष ही सफलता की जननी है और पिछले कुछ दिनो से देवनाथपट्टी के युवा परिवर्तन के प्रति जिस तरह प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं इससे यह प्रतीत होता है कि गाँव का भविष्य उज्जवल है बस जरूरत है युवाओं को एकजुट होकर निरंतर संघर्ष को आगे बढ़ाने का,संघर्ष लगातार अगर जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश पटल पर देवनाथपट्टी का भी स्थान होगा ।
आलोक कुमार
*अपना समाज आपका सुझाव देवनाथपट्टी युवा सदस्य*
इतिहास गवाह है युवाओं ने जब भी परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई है एक नई क्रांति का आगाज हुआ है और देवनाथपट्टी गाँव के युवा परिवर्तन की पटकथा लिख रहे हैं लेकिन एक बड़ा सवाल है कि आखिर कहाँ चूक हुआ कि कभी यहा संघर्ष के बदौलत बने सबसे छोटा गाँव मे मुखिया तेजनारायण बाबू के समय मे जो कुछ जो ही हुआ उनके समय फंड भी उतना नही था सूनता हूँ और देखता भी उनके द्वारा बनाये गये गाँव के चारो तरफ छरकी जो आज भी यहाँ के किसान के लिए सबसे बड़ा धरोहर है गाँव से नदी की ओर जाने वाली मुख्य सड़क जो भविष्य मे आपके जिला मुख्यालेय जाने के लिए इस गाँव के लिए सबसे बड़ी सड़क है आज मे देखता हूँ उन के बाद ऐसा कोई काम यहाँ नही हो पाया जो इस गाँव के लिए कीया गया हो उस ढंग का विकास अब तक नहीं हो पाया जैसा उम्मीद था
दरअसल बचपन में स्कूल जाने के रास्ते में एक दीवार पर लिखा रहता था हम सुधरेगे जग सुधरेगा उस वक्त इसका मतलब समझ में आए ना आए लेकिन इस वाक्य को पढ़ते हर रोज थे. हालांकि अब एक बात समझ में आया है कि हम सुधरेंगे तो दरअसल जग नहीं सुधरेगा बल्कि दुनिया के और लोग सुधरे हुए आदमी को नेता बना कर उसको उसी समाज के समस्या के तथाकथित कारक परंपरागत नेता में तब्दील कर देंगे और फिर उसकी आलोचना की जाएगी जबकि आदर्श स्थिति में होना यह चाहिए कि अगर कोई कुछ अच्छा या अलग काम कर रहा है समाज सुधारने के लिए अगर थोड़ा भी प्रयास कर रहा है तो उससे प्रेरणा लेकर वही चीज़ हम खुद भी करें ना कि जो वह कर रहा है उसको महिमामंडित कर एक स्थापित या घाघ नेता में तब्दील कर दे ।
वैसे भी दुनिया का परंपरा रहा है परिवर्तन होते रहना चाहिए क्योंकि रुकना किसी भी चीज का सही नहीं है पानी खून समय या कुछ भी हो, हर बार एक नया चेहरा आए क्रांतिवीर के रूप में और समाज को एक नया दिशा दें दरअसल हम समाज को जितना समझ पाए हैं समाज के लोग नेगेटिव चीज को ज्यादा पसंद करते हैं कुछ ठीक करने के बजाय उसकी आलोचना करना ज्यादा महत्वपूर्ण समाज के लिए हो जाता है जब की ऐसा होना नहीं चाहिए लेकिन सच्चाई यही है !
समाज का एक और दुखद दृष्टिकोण किसी को नेता मान लेना है । कोई किसी को क्यों नेता मान लेता है ? क्या हम खुद के नेता खुद नहीं हो सकते हैं क्यों हम किसी को सर्व शक्तिमान मान और उसके चारों ओर परिक्रमा करें क्या कमी है हम में क्या हम अपने खुद का समस्या आसपास के समस्या के लिए संघर्ष करने की स्थिति में नहीं है ? नही हैं तो क्यों ! बहरहाल यही सब कारण रहा होगा कि देवनाथपट्टी मे मुखिया जी के बाद जैसी विकास होना चाहिए था वैसी हो नहीं पाया। और लोग कोसते हैं जनप्रतिनिधियों को अधिकारियों को लेकिन कहीं ना कहीं उनके साथ साथ हम और आप खुद भी गुनाहगार है क्योंकि हम सब गलत को गलत कहना भूल गए समस्याओं को उठाना छोड़ दिए कंप्रोमाइज करना शुरू कर दिए और अगर थोड़ा जागरूक है तो इन सब चीजों के लिए किसी व्यक्ति पर निर्भर हो गए है जिसे हम अपना नेता मान बैठे है जबकि समस्याओं के समाधान के लिए खुद लड़ाई लड़ने का जरूरत था या है भी ।
कुछ नही कर सकते तो गलत के खिलाफ लिख तो सकते है दरअसल समाज के हित की लड़ाई में इस गाँव के लोगों का भी काफी अहम योगदान रहता है हाल फिलहाल मे ऐसे उदाहरण दिखे गये है।शान और की यह भूमि है
हर वर्ष यहां के लोग बाढ़ की विभीषिका झेलते हैं इन सबके बावजूद भी जो विकास होना चाहिए था नहीं हो पाया इसका बड़ा कारण इस गाँव के विकास के लिए यहाँ के जनप्रतिनिधी और समाज दोनों को साझा प्रयास करने की आवश्यकता है,लेकिन सच्चाई है दोनों मे से किसी का प्रयास सराहनीय नही कहा जा सकता है. हां दोनों ने दूसरे का आलोचना खूब जमकर किया है जनप्रतिनिधी कहते लोग जागरुक नहीं है वही समाज कहते है कि जनप्रतिनिधी ने प्रयास नहीं किया है आरोप प्रत्यारोप के दौर में गाँव का विकास नहीं हो पाया है अगर यह कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
दरअसल परिवर्तन के लिए समाज के लोग अगर आगे आ रहे हैं तो उन्हे हर घृणित चीज जो समाज में अब भी समान्य माना जाता है उसे ना करना या कहना सीखना होगा हमें बदलाव के आवाज मे गति लानी होगी
इस तरह के परिवर्तन के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि औरों से पहले खुद से जंग लड़ना होगा,समाज के सभी लोगों को क्षेत्र के उत्थान के लिए आगे बढ़ना होगा
हर समस्या के लिए जनप्रतिनिधी पर उंगली उठाने के साथ-साथ समाज को भी अपना कर्तव्य निभाना होगा जैसे कि गाँव मे लोगो को में अपने अधिकार एवं विकाश के रास्ता को समझाना होगा एकजूटा तो बनानी पड़े गी वहाँ पर सरकार की आलोचना करने के साथ-साथ गाँव के शिक्षित लोग को समय निकालकर गाँव में जाकर गाँव वालो को समझाना होगा ये अकेला संभव नही है हम सभी को मिलकर करना होगा अपने गाँव के हित के लिए बस एक बार प्रयाश करना पड़ेगा गाँव का विकाश होगा तो कही न कही सब का फायदा होगा न होगा तो जैसे के तैसे तो है ही।
दरअसल हमे आजाद हुए सात दशक से ऊपर हो गए है अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त जरूर हो गए हम हालांकि उस समय संघर्ष का अलग मतलब था अपनी धरती अपने आकाश पर हक की लड़ाई थी
उसके बाद कुछ समय तक नई प्राप्त स्वतंत्रता में व्यवस्थाएं प्रणालियां तय होती रही और वह दौड़ भी गुजर गया
इन व्यवस्थाओं में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन तो हुआ लेकिन मानसिक परिवर्तन जैसा होना चाहिए था नही हुआ,गुलाम सोच लोगों में चिपका ही रह गया,कम से कम महिलाओं से जुड़ी धारणाओं के बारे में तो ऐसा ही कहा जा सकता है दहेज और समानता, कन्या भ्रूण हत्या और सुरक्षा के मसले पर जो व्यवस्था की गई इससे समाज मे महिलाओं की स्थिति मे विशेष परिवर्तन नही हुआ
भगत सिंह ने कहा है कि जो व्यक्ति विकास के लिए खड़ा है उसे हर रूढ़िवादी चीज की आलोचना करनी होगी उसमें अविश्वास करना होगा तथा उसे चुनौती देनी होगी
ये बिल्कुल सही भी इसलिए हैं क्योंकि परिवर्तन के लिए पहले जनजागरण फिर आंदोलन जरूरी हैं, जनजागरण के बाद गाँव की 50% आबादी भी बात को समझने लगे,गलत के खिलाफ आवाज उठाना सिख जाए, तो वही परिवर्तन का सृजन होना शुरू हो जाएगा
दरअसल हम समाजीकता की भी बात करते हैं लेकिन हम सब का इसमें भी कोई विशेष विश्वास नही हैं,ऐसा इसलिए प्रतित होता क्योंकि जहाँ एक ओर संस्कृति या धर्म के आधार पर हम सभी नदी पेड़ पौधे यहाँ तक की स्त्री को देवी देवता मानते हैं वही दुसरी ओर इसकी स्थिति बिल्कुल विपरीत हैं ।
दरअसल हम दोषी हैं हर उस चीज के लिए जिस पर हम यह सोच कर ध्यान नही देते हैं कि इससे हमारा क्या वास्ता हैं.हर उस वक्त जब हमने गलत के खिलाफ आवाज नही उठाया हम दोषी हैं ! किसी ने कहा है कि अन्याय करने के साथ-साथ अन्याय सहने वाला दोनों बराबर का दोषी है
क्योंकि हम या आप अपने उस आवाज को उठानें में असमर्थ रहें जो आवाज बदलाव ला सकतें थें,दरअसल हम डरतें हैं सबके सामने आकर खुल कर कहनें सें लोगों से अलग दिखाई देने में.अगर आप या हम यह निश्चय कर लेते हैं कि अब चुप नही बैठेंगे तो धीरे धीरे समाज की सोच में बदलाब आने लगता हैं उनकी सोच बदलने लगती हैं, हर विषयों के प्रति उनमें सवेंदनशीलता आने लगती हैं.
जब हम या आप किसी चीज के खिलाफ खड़े होने का फैसला करतें हैं तो भले ही शुरूआत में लोग आपका विरोध करें लेकिन लोग बाद में आपकों समझनें लगतें हैं.
और यदि हमें लोगों की सोच बदलना हैं तो इसकी शुरूआत हमें खुद से करना होगा.
याद रखिए कुछ लोगो के आवाज को दबाया जा सकता है समूह के आवाज को नही दवाया जा सकता हैं.
जहां तक सवाल है आलोचकों का तो हर काल में समाज में कुछ आलोचक रहे हैं उन्हें नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ने की आवश्यकता है हालांकि आलोचना भी कई मायनों में जरूरी है क्योंकि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में हर चीज पर तर्क वितर्क होना चाहिए हम किसी भी बात को बिना तर्क के मान ले तो निश्चित रुप से यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सही नहीं है
परिवर्तन के रास्ते में कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो बोलेंगे ये सबसे से होता क्या है दरअसल इससे सिद्ध होता है हम जीवित हैं अटल हैं और मैदान से हटे नहीं है हमें अपने हार ना मानने वाले स्वाभिमान का प्रमाण देना है हमें यह दिखाना है कि हम गोलियों और अत्याचारों से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं है हम उस व्यवस्था का अंत कर के रहेंगे जिसका आधार स्वार्थीपन है
दरअसल संघर्ष ही सफलता की जननी है और पिछले कुछ दिनो से देवनाथपट्टी के युवा परिवर्तन के प्रति जिस तरह प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं इससे यह प्रतीत होता है कि गाँव का भविष्य उज्जवल है बस जरूरत है युवाओं को एकजुट होकर निरंतर संघर्ष को आगे बढ़ाने का,संघर्ष लगातार अगर जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश पटल पर देवनाथपट्टी का भी स्थान होगा ।
आलोक कुमार

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