Sunday, April 21, 2019

        हम सब करेंगे मतदान तो बढ़ेगी सीतामढ़ी की शान !!


एक जागरूक मतदाता होने के नाते और एक समझदार नागरिक होने के नाते हमारा यह कर्तव्य बनता है ,कि हम खुद तो मतदान करें ही और दूसरों को भी मतदान के लिए प्रेरित करें। क्योंकि हमारे आपके द्वारा चुनी हुई सरकार ही पांच साल तक शासन चलाती हैं।और ह जात पात से उपर उटकर ,राष्ट और अपने क्षेत्र हित को देखते हुए अच्छे उम्मीदवार के लिए बिना किसी पक्षपात के अपना मतदान अवश्य करें। योग्य उम्मीदवार को चुनना चाहिए ।जिसकी बातें ,नीतियां ,विचार.... जिसके काम करने के तरीके आपको पसंद हो।

जिस प्रकार रक्तदान ,अंगदान महान कार्य हैं ।उसी प्रकार मतदान भी एक दान है और इसे अवश्य कीजिये ।

एक -2 मत वोट से सरकारें बनती हैं और गिर जाती हैं ।तेरह दिन की   स्वर्गीय 🙏🙏 पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार इसका उदाहरण है।मतदाता लोकसभा के सांसद का चुनाव, चुनाव के समय अपने मत का उपयोग करके करते हैं।।                                                   वोट आपका अधिकार है। इसका प्रयोग अवश्य करें। साथ ही निष्पक्ष व्यवस्था के लिए प्रशासन का सहयोग करें। शांतिपूर्ण मतदान करें। असामाजिक तत्वों और अफवाह फैलाने वाले से सावधान रहें।

                                                           आलोक कुमार



Sunday, January 13, 2019


*सीतामढ़ी लोक सभा के मद्देनज़र जानने की कोशिश की है कि आखिर कैसा हो हमारा नेता*
                      *इस पर अपनी राय दे*
*हमारा नेता कैसा हो जो हमारी समस्याओं के प्रति हो गंभीर*
●लोकतांत्रिक व्यवस्था के सुचारू संचालन व जनकल्याणकारी सरकार के लिए एक बेहतर जनप्रतिनिधि का चयन बेहद जरुरी है। जनप्रतिनिधि का मतलब जनता का प्रतिनिधित्व करने वाला, उनकी आवाज़ बनने वाला। लेकिन पिछले कुछ सालों से जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों पर सवाल उठने लगे हैं। जनता के चुने हुए प्रतिनिधि उनकी आवाज़ बनने की बजाय सत्ता की चकाचौंध में खोते दिख रहे। संघर्ष करने वाले नेताओं की बजाय धनबल, जनता के समस्या से लपरवाह प्रवृत्ति वालों की भरमार होती जा रही। आखिर राजनीति के इस बदले स्वरुप का जिम्मेदार कौन है। जनता को कैसा जनप्रतिनिधि चाहिए।
●हमने सीतामढ़ी लोक सभा के मद्देनज़र जानने की कोशिश की है कि आखिर कैसा हो हमारा नेता? इसके लिए समाज के हरवर्ग के दिल की आवाज़ को समाज की आवाज़ बनाने के लिए हमने अभियान की शुरुआत की है। शनिवार को इस मुद्दे पर उस वर्ग से जानने की कोशिश की गई जो समाज का पथप्रदर्शक माना जाता है। आइये जानते हैं सीतामढ़ी के जनता क्या चाहता, कैसा हो उनका नेता?


●आलोक सिंह ने कहा कि जनप्रतिनिधि का मतलब वह जो जो जनता के लिए संघर्ष कर सके। पहले से जनता के साथ जुड़ा रहा हो और जनता के लिए संघर्ष करता हो। देखा जाता है जनता जाति, धर्म और पैसा-बाहुबल को तरजीह देकर अपना चुनाव कर देती है लेकिन बाद में शिकायत करती है। जो पहले किसी के लिए संघर्ष न किया हो वह बाद में क्या करेगा। उन्होंने कहा कि कोई कितना भी मृदुभाषी, सम्पत्तिशाली क्यों हो वह जनता के लिए संघर्ष नहीं किया है तो आगे भी नहीं करेगा। लेकिन जनता भावनाओं में बहक जाती है। हमारा प्रतिनिधि वह हो जो हमारी आवाज़ बन सके, हमारे लिए संघर्ष कर सके। हमारे मुद्दों को बेहतर ढंग से जानकर उचित तरीके से उसका निराकरण करा सके।
*आलोक सिंह समाज सेवी अपना समाज आपका सुझाव देवनाथपट्टी गुप्र सदस्य*



●मोनू ने कहा कि जनता का प्रतिनिधि वह होना चाहिये जो जनता के बीच रहता हो। समाज और लोगों की समस्याओं से रूबरू होता हो, उनको बेहतर ढंग से समझता हो। समाज और जन की समस्याओं को समझ उसके लिये काम कर सके। अगर सीतामढ़ी के परिवेश में देखे तो यहां तमाम समस्याएं हैं। स्वास्थ्य, सड़क शिक्षा समस्या यहां प्रमुख हैं। 

उन्होंने कहा कि अगर जनता ने सही जनप्रतिनिधि चुना हो तो वह इन समस्याओं के लिए संघर्ष करेगा। उनके निराकरण की खातिर उचित फोरम में आवाज़ उठाएगा। परंतु जब जनप्रतिनिधि आमजन के बीच रहेगा नहीं तो उसे इन समस्याओं से कोई मतलब नहीं होगा। जब हम जाति, वर्ण, धर्म और धनबल से इतर जनता का प्रतिनिधित्व करने वाला नेता चुनेंगे तो वह जनता से जुड़ उनके के  लििए काम करेगें।


●आलोक रंजन जी ने कहा कि जनता का प्रतिनिधित्व वह करे जो अपनी जनता को समझ सके। अपने क्षेत्र की समस्याओं को जानता हो, उसके हल के लिए जनता की आवाज़ बन सके। इसके लिए एक सबसे बड़ी अर्हता हो कि वह पढ़ा-लिखा हो। उसकी समाज में बेहतर छवि हो। आमतौर पर देखा जाता है कि के बल पर तमाम लोग चुनाव जीत जाते। जनता भी फौरी तौर पर उनको समर्थन दे देती लेकिन आगे के पांच साल वह पछतावा करती है। हमको ऐसे लोगों को चुनना चाहिए जो हमारे बीच का हो, हमारे लिए संघर्ष करता हो। महिला होने के नाते हमको यह देखना होगा कि वह आधी आबादी की समस्याओं को किस स्तर तक समझ सकता और उनके लिए किस स्तर तक आवाज़ बुलंद कर सकता


●मनिष ने कहा कि हमारा नेता वह हो जो वस्तुस्थिति से वाकिफ हो, विषय का ज्ञान हो, समझने वाला हो। ऐसा हो जो समस्याओं को सुलझाने में रुचि ले सके। जो जाति-धर्म और अन्य विवादों से ऊपर की सोच विकास और जनसमस्याओं को निपटान करने में अपनी क्षमता को लगाये। भारतीय संविधान में भले ही जनप्रतिनिधियों की शिक्षा तय नहीं है लेकिन यह माना जाता है कि जो चुना जाएगा वह बेहतर समझ रखता है। लेकिन व्यवस्था के संचालक हमारे नेता खुद अपनी समस्याओं में उलझते जा रहे। आखिर ऐसा कौन सा कारक है कि एक राजनैतिक व्यक्ति और आमजन के आय की वृद्धि में असमानता है। निश्चित रूप से इसपर सबको विचार कर नेता चुनना होगा। आयोग को भी 'नोटा' की तरह 'राईट टू रिकॉल' की व्यवस्था पर विचार करना होगा। एक मानक तय करना होगा कि इतना नोटा वोट होने पर फिर चुनाव हो। यह बेहतरी की ओर एक कदम साबित होगा।



●कुन्दन ने कहा  कि जनप्रतिनिधि वह होना चाहिए जो हमारे बीच का हो। जनता की इच्छाओं को समझ सके, उसके अनुरूप काम कर सके। वह बिना किसी भेदभाव क्षेत्र का विकास कर सके। लेकिन आजकल हो इसके विपरीत रहा। जनता अपने जनप्रतिनिधियों का चुनाव संघर्ष या लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर कसकर देखने के बाद करने की बजाय जाति-धर्म, धन-संपत्ति और अन्य मानकों ओअर कर दे रही। इसका खामियाजा समाज को भुगतान पड़ रहा। हमारा नेता एक स्वच्छ और साफ़ सुथरी छवि का विकास को तरजीह देने वाला होना चाहिए।
                                *आलोक सिंह*
*अपना समाज आपका सुझाव देवनाथपट्टी*

Saturday, December 22, 2018

*इसकी_दो_सबसे_बड़ी_वजह* *आये_जानते_क्या_है_वजह*
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●इसकी दो बड़ी वजह है एक ही ज्यादातर जनप्रतिनिधी अपने       अधिकार के बारे में नहीं जानते।।
●दूसरा कि अधिकारी उन्हें सही सही जानकारी नहीं देता ।।
■अगर आपको जानकारी ही नहीं होगी तो आप जनता की अपेक्षाओं के लिए आवाज कैसे उठा सकेंगे आपको जनता ने अपना नेता चुना है आप जानकारी के अभाव में उनके नेतृत्व कर सकेंगे आपने देखा होगा कि जो विधायक या सांसद, सिस्टम ,नियम ,कानून ,प्रक्रिया, योजना, कार्यक्रम ,की ताजा स्थिति आदि के बारे में ज्यादा जानकारी रखते हैं वही सांसद या विधान मंडल में ज्यादा आवाज उठाते हैं सरकार पर दबाव बनाते हैं अफसर उन से खौफ रहते है। जनता उन्हें ज्यादा तरहीज देते है मीडिया मे वही ज्यादा छाये रहते है उनकी पहचान भी ज्यादा होती है आप क्या करेंगे। चुनाव के टाइम रीशतेदारी निभाते रहेंगे। या अधिकारीयो और मुखिया के हाथो उपयोग होते रहेंगे आप कहा से और कौसे जनकारी करेगें जी इसके लिए आसान और कारगर रास्ता है। आपको खूद जागरूक होना होगा तभी विकास संभव है।।


                                  🦁 अपना समाज आपका सुझाव 🦁
                                            🚩देवनाथपट्टी🚩
                                          🌹 आलोक कुमार 🌹
                                                    🙏🙏
*हमारे_सामाज_का_नेता_कैसा_हो_हमारा_नेता_कैसा_हो*


  बिना नेता के  समाज नहीं होता और नेता  के लिए समाज का होना आवश्यक है ! वह अपने स्वभाव सिद्ध गुणों  से तथा अपनी  उपयोगिता के कारण पूजनीय होता है !गाँव का तथा  समाज का उत्थान नेता पर निर्भर करता  है !नेता यदि पथ भ्रस्ट हुआ तो गाँव और समाज भी पतन की ओर अग्रसर  हो जाता है आजकल  हमारी   परेशानियों की जड़ हमारा गलत नेता  ही है ! प्राचीन भारतीय संस्कृति  ने बहुत सोच समझ कर नेता की व्याख्या की थी जो व्यक्ति नीति का पालन करे और चलावे वही नेता होगा ! नयन करने वाली चीज  का नाम नीति है यानी सम्यक रूप से सुमार्ग में  चलने वाली वास्तु  का नाम नीति है !जब हमारा नेता ही पथ भ्रस्ट होगा तो हम ऐसे नेताओ से कैसे समाज और देवनाथपट्टी निर्माण की कल्पना कर सकते है ! क्योकि जिसके पास जो होता है वही समाज और गाँव को बाटता है ! अगर हमारा नेता भ्रस्टाचारी अपराधी और बलात्कारी होगा तो समाज और गाँव में ऐसी ही घटनाये फैलेगी ! इसलिए समाज के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी है की समाज और गाँव के निर्माण के लिए जाति और संप्रदाय से ऊपर उठकर अच्छा ईमानदार सदाचारी नेता का चयन करना चाहिए ! जिस प्रतिनिधी दल से अनुशासन उठ गया है तथा अवज्ञा करने वालो के दंड का विधान बहुत  कम है , उस प्रतिनिधी दल  का भविष्य उज्जवल नहीं कहा जा सकता ! अपनी नीति को अनुशासन पूर्वक नहीं मनवा सकता ,वह नेता नहीं हो सकता है ! नेता  का गुण बतलाता है !"जब दंडनीति भली प्रकार से नेता में स्थिर रहती है ,तब वह विद्या को  जानने वाला सम्पूर्ण शेष विद्याओ को प्राप्त होता है !'' कफ्यूसियस ने आज से २३०० वर्ष पहले जो  बात कही थी , उसे कोई कैसे काट सकता है ?कौन कह सकता है कि मानव के लिए ऊपर लिखी व्याख्या के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार का नेता चाहिए !कठिनाई यही है की हम शास्त्र द्वारा  प्रमाणित नेता को  खोजते नहीं , तलाश नहीं करते या यदि हमें मिलता भी  है तो उसकी कद्र नहीं   करते ! जैसा समाज होता है ,वैसे ही नेता भी पैदा होता है ! जिसे सच्चे नेता की आवस्यकता हो उसे अपना स्तर भी ऊँचा करना होगा ,आज जनता ईमानदार नेता ,ईमानदार  अफसर कब कब  चाहती है ?जनता चाहती है बेईमान नेता  अफसर जो रिस्वत लेकर  हमारे  गलत कार्यो को करा सके !नेता का स्तर सुधारने से पहले हमें जनता का स्तर  सुधारना होगा !जनसाधारण मतदाता को समझना होगा कि वह अपना स्वार्थ न देखे , देश हित देखे और ईमानदार ,आदर्शवादी और  सेवाभावी नेता का चयन करे !!!
        अपना समाज आपका सुझाव
                     देवनाथपट्टी
                   आलोक कुमार
               समाजिक कार्यक्रता

भ्रष्टाचार के कारण हमारे समाज मे फैलने वाली बिमारी जिसके कारण आज समाज मे अनेको दलाल है।                                 

भ्रष्टाचार समाज में तेजी से फैलने वाली बीमारी है जिसने बुरे लोगों के दिमाग में अपनी जड़े जमा ली है। कोई भी जन्म से भ्रष्ट नहीं होता बल्कि अपनी गलत सोच और लालच के चलते धीरे-धीरे वो इसका आदी हो जाता है। यदि कोई परेशानी, बीमारी आदि कुछ आए तो हमें धैर्य और भरोसे के साथ उसका सामना करना चाहिए और विपरीत परिस्थितियों में भी बुरा काम नहीं करना चाहिए। किसी के एक गलत कदम से कई सारी जिन्दगीयाँ प्रभावित होती है। हम एक अकेले अस्तित्व नहीं है इस धरती पर हमारे जैसे कई और भी है इसलिये हमें दूसरों के बारे में भी सोचना चाहिए और सकारात्मक विचार के साथ जीवन को शांति और खुशी से जीना चाहिए।
आज के दिनों में, समाज में बराबरी के साथ ही आमजन के बीच में जागरुकता लाने के लिये नियम-कानून के अनुसार भारत सरकार ने गरीबों के लिए कई सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई है। जबकि, सरकारी सुविधाएं गरीबों की पहुँच से दूर होती जा रही है क्योंकि अधिकारी अंदर ही अंदर गठजोड़ बना कर गरीबों को मिलने वाली सुविधाओं का बंदरबाँट कर रहे है। अपनी जेबों को भरने के लिये वो गरीबो का पेट काट रहे है।
समाज में भ्रष्टाचार के कई कारण है, आज के दिनों में राजनीतिज्ञ सिर्फ अपने फायदे की नीति बनाते है न कि राष्ट्रहित में। वो बस अपने को प्रसिद्ध करना चाहते है जिससे उनका फायदा होता रहे, उन्हें जनता के हितों और जरुरतों की कोई परवाह नहीं। आज इंसानियत का नैतिक पतन हो रहा है और सामाजिक मूल्यों में हरास हो रहा है। भरोसे और ईमानदारी में आयी इस गिरावट की वजह से ही भ्रष्टाचार अपने पाँव पसार रहा है।
भ्रषटाचार को सहने की क्षमता आम जनता के बीच बढ़ चुकी है। इसकी खिलाफत करने के लिये समाज में कोई मजबुत लोक मंच नहीं है, ग्रामीण क्षेत्रों में फैली अशिक्षा, कमजोर आर्थिक ढ़ाचाँ, आदि कई कारण भी जिम्मेदार है भ्रष्टाचार के लिये। सरकारी कर्मचारियों का कम वेतनमान उन्हें भ्रष्टाचार की ओर विमुख करता है। सरकार के जटिल कानून और प्रक्रिया लोगों को सरकारी मदद से दूर ले जाते है। चुनाव के दौरान तो ये अपने चरम पर होता है। चालाक नेता हमेशा गरीब और अनपढ़ों को ख्याली पुलाव में उलझाकर उनका वोट पा लेते है उसके बाद फिर चंपत हो जाते है।



Friday, December 21, 2018

*देवनाथपट्टी का युवा कर रहा है,अधिकार के लिए आवाज बुलंद*


*अपना समाज आपका सुझाव           देवनाथपट्टी युवा सदस्य*


इतिहास गवाह है युवाओं ने जब भी परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई है एक नई क्रांति का आगाज हुआ है और  देवनाथपट्टी गाँव के युवा परिवर्तन की पटकथा लिख रहे हैं लेकिन एक बड़ा सवाल है कि आखिर कहाँ चूक हुआ कि कभी यहा संघर्ष के बदौलत बने सबसे छोटा गाँव मे मुखिया तेजनारायण बाबू के समय मे जो कुछ जो ही हुआ उनके समय फंड भी उतना नही था सूनता हूँ और देखता भी उनके द्वारा बनाये गये गाँव के चारो तरफ छरकी जो आज भी यहाँ के किसान के लिए सबसे बड़ा धरोहर है गाँव से नदी की ओर जाने वाली मुख्य सड़क जो भविष्य मे आपके जिला मुख्यालेय जाने के लिए इस गाँव के लिए सबसे बड़ी सड़क है आज मे देखता हूँ उन के बाद ऐसा कोई काम यहाँ नही हो पाया जो इस गाँव के लिए कीया गया हो उस ढंग का विकास अब तक नहीं हो पाया जैसा उम्मीद था

दरअसल बचपन में स्कूल जाने के रास्ते में एक दीवार पर लिखा रहता था हम सुधरेगे जग सुधरेगा उस वक्त इसका मतलब समझ में आए ना आए लेकिन इस वाक्य को पढ़ते हर रोज थे. हालांकि अब एक बात समझ में आया है कि हम सुधरेंगे तो दरअसल जग नहीं सुधरेगा बल्कि दुनिया के और लोग सुधरे हुए आदमी को नेता बना कर उसको उसी समाज के समस्या के तथाकथित कारक परंपरागत नेता में तब्दील कर देंगे और फिर उसकी आलोचना की जाएगी जबकि आदर्श स्थिति में होना यह चाहिए कि अगर कोई कुछ अच्छा या अलग काम कर रहा है समाज सुधारने के लिए अगर थोड़ा भी प्रयास कर रहा है तो उससे प्रेरणा लेकर वही चीज़ हम खुद भी करें ना कि जो वह कर रहा है उसको महिमामंडित कर एक स्थापित या घाघ नेता में तब्दील कर दे ।

वैसे भी दुनिया का परंपरा रहा है परिवर्तन होते रहना चाहिए क्योंकि रुकना किसी भी चीज का सही नहीं है पानी खून समय या कुछ भी हो, हर बार एक नया चेहरा आए क्रांतिवीर के रूप में और समाज को एक नया दिशा दें दरअसल हम समाज को जितना समझ पाए हैं समाज के लोग नेगेटिव चीज को ज्यादा पसंद करते हैं कुछ ठीक करने के बजाय उसकी आलोचना करना ज्यादा महत्वपूर्ण  समाज के लिए हो जाता है जब की ऐसा होना नहीं चाहिए लेकिन सच्चाई यही है !

समाज का एक और दुखद दृष्टिकोण किसी को नेता मान लेना है । कोई किसी को क्यों नेता मान लेता है ? क्या हम खुद के नेता खुद नहीं हो सकते हैं क्यों हम किसी को सर्व शक्तिमान मान और उसके चारों ओर परिक्रमा करें क्या कमी है हम में क्या हम अपने खुद का समस्या आसपास के समस्या के लिए संघर्ष करने की स्थिति में नहीं है ? नही हैं तो क्यों !  बहरहाल यही सब कारण रहा होगा कि देवनाथपट्टी मे मुखिया जी के बाद जैसी विकास होना चाहिए था वैसी हो नहीं पाया। और लोग कोसते हैं जनप्रतिनिधियों को अधिकारियों को लेकिन कहीं ना कहीं उनके साथ साथ हम और आप खुद भी गुनाहगार है क्योंकि हम सब गलत को गलत कहना भूल गए समस्याओं को उठाना छोड़ दिए कंप्रोमाइज करना शुरू कर दिए और अगर थोड़ा जागरूक है तो इन सब चीजों के लिए किसी व्यक्ति पर निर्भर हो गए है जिसे हम अपना नेता मान बैठे है जबकि समस्याओं के समाधान के लिए खुद लड़ाई लड़ने का जरूरत था या है भी ।


कुछ नही कर सकते तो गलत के खिलाफ लिख तो सकते है दरअसल समाज के हित की लड़ाई में इस गाँव के लोगों का भी काफी अहम योगदान रहता है हाल फिलहाल मे ऐसे उदाहरण दिखे गये है।शान और की यह भूमि है

हर वर्ष यहां के लोग बाढ़ की विभीषिका झेलते हैं इन सबके बावजूद भी जो विकास होना चाहिए था नहीं हो पाया इसका बड़ा कारण इस गाँव के विकास के लिए यहाँ के जनप्रतिनिधी और समाज दोनों को साझा प्रयास करने की आवश्यकता  है,लेकिन सच्चाई है दोनों मे से किसी का प्रयास सराहनीय नही कहा जा सकता है. हां दोनों ने दूसरे का आलोचना खूब जमकर किया है जनप्रतिनिधी कहते लोग जागरुक नहीं है वही समाज कहते है कि जनप्रतिनिधी ने प्रयास नहीं किया है आरोप प्रत्यारोप के दौर में गाँव का विकास नहीं हो पाया है अगर यह कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।


दरअसल परिवर्तन के लिए समाज के लोग अगर आगे आ रहे हैं तो उन्हे हर घृणित चीज जो समाज में अब भी समान्य माना जाता है उसे ना करना या कहना सीखना होगा हमें बदलाव के आवाज मे गति लानी होगी
इस तरह के परिवर्तन के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि औरों से पहले खुद से जंग लड़ना होगा,समाज के सभी लोगों को क्षेत्र के उत्थान के लिए आगे बढ़ना होगा
हर समस्या के लिए जनप्रतिनिधी पर उंगली उठाने के साथ-साथ समाज को भी अपना कर्तव्य निभाना होगा जैसे कि गाँव मे लोगो को में अपने अधिकार एवं विकाश के रास्ता को समझाना होगा एकजूटा तो बनानी पड़े गी  वहाँ पर सरकार की आलोचना करने के साथ-साथ गाँव के शिक्षित लोग को समय निकालकर गाँव में जाकर गाँव वालो को समझाना होगा ये अकेला संभव नही है हम सभी को मिलकर करना होगा अपने गाँव के हित के लिए बस एक बार प्रयाश करना पड़ेगा गाँव का विकाश होगा तो कही न कही सब का फायदा होगा न होगा तो जैसे के तैसे तो है ही।

दरअसल हमे आजाद हुए सात दशक से ऊपर हो गए है अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त जरूर हो गए हम हालांकि उस समय संघर्ष का अलग मतलब था अपनी धरती अपने आकाश पर हक की लड़ाई थी

उसके बाद कुछ समय तक नई प्राप्त स्वतंत्रता में व्यवस्थाएं प्रणालियां तय होती रही और वह दौड़ भी गुजर गया

इन व्यवस्थाओं में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन तो हुआ लेकिन मानसिक परिवर्तन जैसा होना चाहिए था नही हुआ,गुलाम सोच लोगों में चिपका ही रह गया,कम से कम महिलाओं से जुड़ी धारणाओं के बारे में तो ऐसा ही कहा जा सकता है दहेज और समानता, कन्या भ्रूण हत्या और सुरक्षा के मसले पर जो व्यवस्था की गई इससे समाज मे महिलाओं की स्थिति मे विशेष परिवर्तन नही हुआ


भगत सिंह ने कहा है कि जो व्यक्ति विकास के लिए खड़ा है उसे हर रूढ़िवादी चीज की आलोचना करनी होगी उसमें अविश्वास करना होगा तथा उसे चुनौती देनी होगी

ये बिल्कुल सही भी इसलिए हैं क्योंकि परिवर्तन के लिए पहले जनजागरण फिर आंदोलन जरूरी हैं, जनजागरण के बाद गाँव की 50% आबादी भी बात को समझने लगे,गलत के खिलाफ आवाज उठाना सिख जाए, तो वही परिवर्तन का सृजन होना शुरू हो जाएगा


दरअसल हम समाजीकता की भी बात करते हैं लेकिन हम सब का इसमें भी कोई विशेष विश्वास नही हैं,ऐसा इसलिए प्रतित होता क्योंकि जहाँ एक ओर संस्कृति या धर्म के आधार पर हम सभी नदी पेड़ पौधे यहाँ तक की स्त्री को देवी देवता मानते हैं वही दुसरी ओर इसकी स्थिति बिल्कुल विपरीत हैं ।

दरअसल हम दोषी हैं हर उस चीज के लिए जिस पर हम यह सोच कर ध्यान नही देते हैं कि इससे हमारा क्या वास्ता हैं.हर उस वक्त जब हमने गलत के खिलाफ आवाज नही उठाया हम दोषी हैं ! किसी ने कहा है कि अन्याय करने के साथ-साथ अन्याय सहने वाला दोनों बराबर का दोषी है
क्योंकि हम या आप अपने उस आवाज को उठानें में असमर्थ रहें जो आवाज बदलाव ला सकतें थें,दरअसल हम डरतें हैं सबके सामने आकर खुल कर कहनें सें लोगों से अलग दिखाई देने में.अगर आप या हम यह निश्चय कर लेते हैं कि अब चुप नही बैठेंगे तो धीरे धीरे समाज की सोच में बदलाब आने लगता हैं उनकी सोच बदलने लगती हैं, हर विषयों के प्रति उनमें सवेंदनशीलता आने लगती हैं.
जब हम या आप किसी चीज के खिलाफ खड़े होने का फैसला करतें हैं तो भले ही शुरूआत में लोग आपका विरोध करें  लेकिन लोग बाद में आपकों समझनें लगतें हैं.
और यदि हमें लोगों की सोच बदलना हैं तो इसकी शुरूआत हमें खुद से करना होगा.
याद रखिए कुछ लोगो के आवाज को दबाया जा सकता है समूह के आवाज को नही दवाया जा सकता हैं.
जहां तक सवाल है आलोचकों का तो हर काल में समाज में कुछ आलोचक रहे हैं उन्हें नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ने की आवश्यकता है हालांकि आलोचना भी कई मायनों में जरूरी है क्योंकि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में हर चीज पर तर्क वितर्क होना चाहिए हम किसी भी बात को बिना तर्क के मान ले तो निश्चित रुप से यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सही नहीं है
परिवर्तन के रास्ते में कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो बोलेंगे ये सबसे से होता क्या है दरअसल इससे सिद्ध होता है हम जीवित हैं अटल हैं और मैदान से हटे नहीं है हमें अपने हार ना मानने वाले स्वाभिमान का प्रमाण देना है  हमें यह दिखाना है कि हम गोलियों और अत्याचारों से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं है  हम उस व्यवस्था का अंत कर के रहेंगे जिसका आधार स्वार्थीपन है
दरअसल संघर्ष ही सफलता की जननी है और पिछले कुछ दिनो से देवनाथपट्टी के युवा परिवर्तन के प्रति जिस तरह प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं इससे यह प्रतीत होता है कि गाँव का भविष्य उज्जवल है बस जरूरत है युवाओं को एकजुट होकर निरंतर संघर्ष को आगे बढ़ाने का,संघर्ष लगातार अगर जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश पटल पर देवनाथपट्टी का भी स्थान होगा ।


आलोक कुमार
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        हम सब करेंगे मतदान तो बढ़ेगी सीतामढ़ी की शान !! एक जागरूक मतदाता होने के नाते और एक समझदार नागरिक होने के नाते हमारा यह कर्त...